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ब्रिज कोर्स, PDPET और विशिष्ट बीटीसी :प्राथमिक शिक्षा में PDPET सहित बीएड का भविष्य

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ब्रिज कोर्स, PDPET और विशिष्ट बीटीसी : प्राथमिक शिक्षा में PDPET सहित बीएड का भविष्य राहुल पांडे अविचल  तीन अलग-अलग प्रशिक्षण संरचनाएँ—ब्रिज कोर्स, PDPET और विशिष्ट बीटीसी—दिखने में भले ही स्वतंत्र पाठ्यक्रम प्रतीत हों, किंतु उनके भीतर प्रवाहित शैक्षणिक दर्शन एक ही मूल बिंदु से निकलता है : प्राथमिक शिक्षा के लिए एक सक्षम, संवेदनशील, उत्तरदायी और व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित शिक्षक का निर्माण करना। अंतर केवल इस बात का है कि यह लक्ष्य किस गहराई, किस अवधि और किस विधिक-शैक्षणिक मानक के साथ साधा जा रहा है। ब्रिज कोर्स को यदि गंभीरता से देखा जाए तो यह पूर्ण शिक्षक-प्रशिक्षण नहीं है, बल्कि एक संक्रमणकालीन व्यवस्था है। इसका उद्देश्य उन शिक्षकों को न्यूनतम शैक्षणिक आधार से जोड़ना है जो पहले से सेवा में हैं अथवा किसी कारणवश निर्धारित प्रारंभिक शिक्षक-प्रशिक्षण से वंचित रह गए। बाल विकास, शैक्षिक मनोविज्ञान, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, पाठ्यक्रम-बोध और सीमित विषय-पेडागॉजी इसके केंद्र में हैं। मूल्यांकन संरचना संक्षिप्त है, विषयों की संख्या सीमित है और विद्यालयीय अभ्यास न्यूनतम है। यह प...

नारायण नाम की महिमा

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प्राचीन काल में कश्यप गोत्र का एक ब्राह्मण था, जिसका नाम था अजामिल। वह अत्यंत सदाचारी, वेदज्ञ और अपने माता-पिता का आज्ञाकारी पुत्र था। उसके जीवन में हर कार्य धर्मसम्मत और यथाविधि होता था। वह नित्य यज्ञ, दान, जप और तप में संलग्न रहता था। किंतु एक दिन उसका भाग्य उसे एक ऐसी दिशा में ले गया जहाँ से उसका पतन आरंभ हुआ। एक बार जब अजामिल वन में अपने पिता के लिए फल-फूल और कुशा आदि एकत्र करने गया, तब उसने वहाँ एक गणिका को एक पुरुष के साथ आलिंगन में देखा। यह दृश्य उसके मन में वासना का ज्वर जगा गया। उस दिन से उसकी दृष्टि धर्म से हटकर अधर्म की ओर मुड़ गई। वह उस स्त्री के मोह में इतना डूबा कि अपनी पत्नी, माता-पिता, गृहस्थ धर्म, सब कुछ त्यागकर उसी के साथ रहने लगा। समय बीतता गया। उस गणिका से उसे कई संतानें हुईं। उनमें सबसे छोटा पुत्र अत्यंत प्यारा था, जिसका नाम उसने रखा — नारायण। अजामिल का सारा स्नेह अब उसी छोटे पुत्र पर केंद्रित हो गया। वह दिन-रात उसी का नाम लेकर पुकारता — “नारायण आओ बेटा”, “नारायण खाओ”, “नारायण खेलो”…। उसके मुख से यह नाम बार-बार उच्चरित होता, पर वह यह नहीं जानता था कि यह...

एक ही रक्त, दो नियतियाँ — अर्जुन, शिशुपाल और कृष्ण का पारिवारिक सत्य

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“एक ही रक्त, दो नियतियाँ — अर्जुन, शिशुपाल और कृष्ण का पारिवारिक सत्य” राहुल पांडे अविचल  महाभारत केवल युद्ध और नीति का ग्रंथ नहीं, बल्कि पारिवारिक संबंधों, भावनाओं और नियति के ताने-बाने का भी विराट आख्यान है। इसके पात्रों के बीच जो रिश्ते हैं, वे महज रक्त-संबंध नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य, प्रेम, द्वेष और ईर्ष्या के विविध रूपों में अभिव्यक्त मानव स्वभाव की गहराइयों को छूते हैं। अर्जुन, शिशुपाल और कृष्ण — तीनों ऐसे पात्र हैं, जिनके बीच का संबंध इस जटिलता का अनूठा उदाहरण है। कृष्ण के पिता वासुदेव मथुरा के राजा शूरसेन के पुत्र थे। शूरसेन की दो प्रसिद्ध पुत्रियाँ थीं — कुंती (जिनका वास्तविक नाम पृथा था) और श्रुतश्रवा। कुंती को बाद में निःसंतान राजा कुन्तिभोज ने गोद लिया, जिससे वे ‘कुंती’ कहलाईं, जबकि श्रुतश्रवा का विवाह चेदि राज्य के राजा दमघोष से हुआ, जिनसे उन्हें पुत्र शिशुपाल प्राप्त हुआ। इस प्रकार वासुदेव, कुंती और श्रुतश्रवा तीनों सगे भाई-बहन हुए। अतः अर्जुन, जो कुंती के पुत्र थे, और शिशुपाल, जो श्रुतश्रवा के पुत्र थे — दोनों भगवान कृष्ण के ममेरे/फुफेरे भाई हुए। अर्थात, जिन तीनों न...

जब हम बिखरते हैं

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जब हम बिखरते हैं राहुल पांडे अविचल  रिश्ते शायद जीवन की सबसे जटिल, सबसे नाज़ुक और फिर भी सबसे सुंदर संरचनाएँ हैं। ये हमारे अस्तित्व का वह हिस्सा हैं जहाँ मनुष्य अपने अकेलेपन से लड़ना सीखता है, पर अक्सर इन्हीं में सबसे ज़्यादा घायल भी होता है। रिश्ते किसी करार की तरह नहीं निभाए जाते, ये तो एक मौन समझौता होते हैं - दिल और आत्मा के बीच का। कोई लिखित अनुबंध नहीं, कोई कानूनी शर्त नहीं; बस भरोसा, सम्मान और भावना की महीन डोर पर टिका एक संसार। और जब यह डोर थोड़ी भी ढीली पड़ती है, तो भीतर की स्थिरता हिल जाती है। रिश्तों में सबसे बड़ी भूल तब होती है जब हम यह मान लेते हैं कि सामने वाला हमें वैसे ही समझेगा, जैसे हम खुद को समझते हैं। पर सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति अपनी परिस्थिति, अपने अनुभव और अपने स्वार्थ से देखता है - कोई मन से, कोई दिमाग से, और कोई बस दिखावे से। यही कारण है कि कभी-कभी जिस सच्चाई को हम समर्पण मानते हैं, वही दूसरे के लिए कमजोरी बन जाती है। रिश्तों का यह असंतुलन बड़ा खतरनाक होता है - एक तरफ़ उम्मीदें, दूसरी तरफ़ उपेक्षा; एक तरफ़ निष्ठा, दूसरी तरफ़ नाटकीयता। धीरे-धीरे...

वैर तो मन का होता है, व्यक्ति का नहीं

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"वैर तो मन का होता है, व्यक्ति का नहीं" मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी भूल यह होती है कि वह दूसरों की सोच को अपनी सच्चाई समझ लेता है। मैं किसी को अपना शत्रु नहीं मानता — क्योंकि शत्रुता भीतर की शांति को नष्ट करती है। द्वेष का बीज जब हृदय में पड़ता है, तो सबसे पहले वही हृदय सूखता है जिसमें वह पनपता है। इसलिए मैंने यह ठान लिया है कि मैं किसी के प्रति वैर, ईर्ष्या या दुर्भावना नहीं रखूंगा। लेकिन यदि कोई मुझे अपना शत्रु मान ले, तो क्या मैं उसके दृष्टिकोण का उत्तरदायी हूं? नहीं। क्योंकि हर व्यक्ति अपने मन के आईने में ही दुनिया देखता है — यदि उस आईने पर राग-द्वेष की धूल जमी हो, तो उसमें किसी की अच्छाई भी धुंधली पड़ जाती है। मेरे कर्म, मेरे विचार, और मेरा मन यदि निर्मल हैं, तो दूसरों की कटुता से मुझे कोई चोट नहीं लग सकती। जो मुझे अपना शत्रु मानता है, संभव है कि उसके अनुभव, उसकी पीड़ाएँ या उसकी असुरक्षाएँ उसे ऐसा सोचने पर विवश करती हों। मैं केवल इतना कर सकता हूँ कि उसके लिए भी सद्भाव रखूँ — क्योंकि मनुष्य की महानता अपने विरोधियों के प्रति भी शुभेच्छा बनाए रखने में है। जीवन की यात्रा मे...

क्षमा की शक्ति

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क्षमा की शक्ति महाभारत केवल एक युद्ध का ग्रंथ नहीं है — वह मनुष्य के अंतःकरण का दर्पण है। उसमें न केवल धर्म और अधर्म का संघर्ष है, बल्कि भावनाओं, निर्णयों और मानवीय दुर्बलताओं की गहरी व्याख्या भी है। इसी महाकाव्य में क्षमा की वह अद्भुत झलक मिलती है जो युगों तक मानवता को दिशा देती रही है — और इस सत्य का सर्वोत्तम उदाहरण हैं महारानी द्रौपदी, पांडव और महात्मा विदुर। जब कौरव सभा में महारानी द्रौपदी को लाया गया, तब वह क्षण केवल एक स्त्री के अपमान का नहीं, बल्कि धर्म की परीक्षा का था। सभाभवन में उस समय उपस्थित थे – पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, आचार्य कृपाचार्य, और चाचा विदुर। सभी धर्म और नीति के रक्षक माने जाते थे। किंतु सत्ता, भय और कर्तव्य के जाल में फंसे उन श्रेष्ठजनों के बीच केवल एक व्यक्ति था जिसने अधर्म के विरुद्ध आवाज़ उठाई — विदुर। विदुर ने धृतराष्ट्र को चेतावनी दी — “राजन! यह अधर्म है। जो पुरुष अपनी सभा में धर्मपत्नी का अपमान सह लेता है, वह अपने कुल का नाश स्वयं करता है। जहां स्त्री रोती है, वहां लक्ष्मी निवास नहीं करती। तुम अपने पुत्रों को रोक लो, अन्यथा विनाश निश्चित है।” किन्त...

संपूर्ण विवरण: पदोन्नति टीईटी नौकरी पार्ट 1.

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संपूर्ण विवरण: पदोन्नति टीईटी नौकरी  पार्ट 1.  तमिलनाडु सरकार शिक्षकों की पदोन्नति कर रही थी। यहां तक कि वह ऐसे शिक्षकों की भी पदोन्नति कर रही थी जो कि प्राथमिक विद्यालय में प्राथमिक स्तर की टीईटी उत्तीर्ण होकर नियुक्ति पाए थे अर्थात इनकी नियुक्ति वर्ष  2010 से 2020 के बीच हुई थी। मगर इनको उच्च प्राथमिक विद्यालय में भेज रही थी और ये उच्च प्राथमिक स्तर की टीईटी उत्तीर्ण नहीं थे। तमिलनाडु के प्राथमिक विद्यालय के उच्च प्राथमिक स्तर की टीईटी उत्तीर्ण शिक्षकों एवं बेरोजगारों ने कहा कि वे उच्च प्राथमिक स्तर की टीईटी उत्तीर्ण हैं उनकी पदोन्नति/नियुक्ति की जाए। बगैर टीईटी उत्तीर्ण की पदोन्नति न की जाए।  तमिलनाडु सरकार ने कहा कि वह नियुक्ति में तो एनसीटीई के नोटिफिकेशन 23/08/2010 और संशोधित नोटिफिकेशन 29/07/2011 को लागू करेंगे अर्थात नई नियुक्ति के टीईटी लागू करेंगे लेकिन पदोन्नति करना राज्य सरकार के सर्विस रूल का मामला है। शिक्षकों का यह अधिकार है कि उनकी पदोन्नति हो उनकी नियुक्ति के साथ ही उनका पदोन्नति का अधिकार हैं।  टीईटी उत्तीर्ण शिक्षक और बेरोजगार मानन...

“Job Security and Promotion of Senior Teachers in the Context of TET”

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Avichal The NCTE, disregarding the proviso under Section 23(2) of the RTE Act, 2009, exercised the powers granted under Section 23(1) of the RTE Act, 2009, and through its Notification dated 23/08/2010, Para 1, prescribed the minimum qualifications for appointment of teachers. According to this notification, teachers appointed before 23/08/2010 were exempted from possessing minimum qualifications under Para 4, and in Para 5, it was decided that recruitments made pursuant to advertisements issued before 23/08/2010 would continue to be governed under the NCTE Regulations, 2001. Subsequently, in 2011, the Central Government strengthened the powers of NCTE further. The NCTE attempted to gradually bring senior and super senior teachers within the ambit of the RTE Act, because it was sympathetic towards those appointed and advertised prior to the enforcement of the RTE Act, and wanted to protect them from its rigid provisions. Furthermore, it did not want to cast a shadow of doubt over the s...

“सीनियर शिक्षकों की सेवा सुरक्षा और पदोन्नति में TET”

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अविचल  एनसीटीई ने RTE एक्ट 2009 के सेक्शन 23(2) के परन्तुक की परवाह न करते हुए RTE एक्ट 2009 के सेक्शन 23(1) में मिली शक्ति के बल पर 23/08/2010 के नोटिफिकेशन के पैरा एक में न्यूनतम योग्यता निर्धारित की। इसके अनुसार दिनांक 23/08/2010 के पूर्व नियुक्त हो चुके शिक्षकों को पैरा 4 में न्यूनतम योग्यता धारण करने से मुक्त किया गया और पैरा 5 में दिनांक 23/08/2010 के पूर्व जारी हो चुके विज्ञापनों को NCTE के विनियम, 2001 से जारी रखने का निर्णय लिया गया। इसके बाद वर्ष 2011 में केंद्र सरकार ने एनसीटीई को और मजबूत बना दिया। NCTE ने सुपर सीनियर शिक्षक और सीनियर शिक्षक को RTE के दायरे में धीरे-धीरे लाने का प्रयास किया, क्योंकि NCTE RTE एक्ट लागू होने के पूर्व नियुक्त और विज्ञापित शिक्षकों के प्रति सहानुभूति रखती थी तथा उन्हें RTE एक्ट के कठोर नियमों से बचाए रखना चाहती थी। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 16 से सुरक्षित किसी शिक्षक की सेवा पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाना चाहती थी। मगर जब NCTE ने दिनांक 12/11/2014 के नोटिफिकेशन के पैरा 4(बी) में सुपर सीनियर शिक्षक और सीनियर शिक्षक को भी पदोन्नति में जिस संव...

जीव विज्ञान शिक्षा : परंपरा, समसामयिक चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा

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वर्ष 1998-99 से कक्षा 9 में जीव विज्ञान विषय को स्वतंत्र रूप से समाप्त कर विज्ञान विषय में समाहित कर दिया गया। इस निर्णय के दूरगामी परिणाम हुए। जीव विज्ञान केवल एक शाखा नहीं है बल्कि यह जीवन के रहस्यों को समझने की आधारशिला है। जब विद्यार्थी कक्षा 9 में पहुंचते हैं, तब उनका मस्तिष्क जिज्ञासा और खोज की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। जीव विज्ञान के पृथक विषय के रूप में अध्ययन से उनमें जीवन, प्रकृति, स्वास्थ्य, पर्यावरण और जीव-जगत के प्रति संवेदनशीलता विकसित होती। लेकिन जब इसे एकीकृत कर दिया गया, तब उसकी गहराई और विषयगत विशिष्टता कहीं न कहीं प्रभावित हुई। विज्ञान एक समग्र विषय है जिसमें भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान तीनों के तत्व होते हैं। किंतु प्रत्येक शाखा की अपनी पद्धति, अपनी भाषा और अपनी प्रयोगशाला-आधारित समझ होती है। जीव विज्ञान को अलग से पढ़ने का अर्थ केवल सैद्धांतिक जानकारी प्राप्त करना नहीं था, बल्कि प्रयोगशाला में प्रैक्टिकल करना, सूक्ष्मदर्शी से कोशिकाओं का अवलोकन करना, पादपों और जंतुओं की संरचना समझना और जीवन के विविध आयामों को करीब से देखना था। जब यह अवसर विद्यार्थियो...

ईरान-इज़रायल युद्ध और भारत की राह: दिल और दिमाग के बीच फंसी एक राष्ट्रनीति

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ईरान-इज़रायल युद्ध और भारत की राह: दिल और दिमाग के बीच फंसी एक राष्ट्रनीति लेखक: राहुल पांडे 'अविचल' जब दो राष्ट्र युद्ध की आग में झुलस रहे हों, तब केवल तलवार नहीं, विवेक भी बोलता है। ईरान और इज़रायल के बीच उठती यह ज्वाला न सिर्फ पश्चिम एशिया, बल्कि भारत के दिल और सोच को भी झकझोर रही है। भारत आज एक कठिन मोड़ पर खड़ा है — एक ओर इज़रायल है, जो वर्षों से भारत का रक्षा साथी रहा है, जिसने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहने की मिसाल दी है। दूसरी ओर ईरान है, हमारी ऊर्जा का स्रोत, हमारी संस्कृति का साझेदार और चाबहार बंदरगाह जैसा रणनीतिक सहयोगी। लेकिन सिर्फ बाहर की दुनिया नहीं, भारत का मन भी दो खेमों में बँटा है। कुछ लोग इज़रायल के साहस और निर्णायक कार्रवाई के प्रशंसक हैं, तो कुछ ईरान को साम्राज्यवाद के खिलाफ एक प्रतिरोध की आवाज़ मानते हैं। तो भारत को क्या करना चाहिए? भारत को भावनाओं से नहीं, बुद्धिमत्ता से चलना होगा। हमें युद्ध नहीं, शांति का पक्ष लेना चाहिए। हमें किसी की आँधी में उड़ने के बजाय अपना संतुलन साधना होगा — जहाँ इज़रायल से हमारी रक्षा की दीवार मज़बूत ह...

जनसंख्या आधारित हिस्सेदारी बनाम उत्तरदायित्व आधारित न्याय : निबंध

जनसंख्या आधारित हिस्सेदारी बनाम उत्तरदायित्व आधारित न्याय राहुल पांडे अविचल  भूमिका: भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां संसाधनों का वितरण, प्रतिनिधित्व और योजनाएं जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर की जाती हैं। किंतु एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या हिस्सेदारी केवल संख्या बल के आधार पर होनी चाहिए, या फिर उस उत्तरदायित्व के आधार पर जो किसी ने देशहित में निभाया है? यह विचार केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक संसाधनों, योजनाओं और सामाजिक न्याय की संपूर्ण प्रणाली पर प्रभाव डालता है। मुख्य तर्क: देश की स्वतंत्रता के समय सभी राज्यों को समान अवसर प्राप्त थे। समय के साथ कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण को प्राथमिकता दी, जागरूकता फैलाई और सीमित संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग किया। वहीं, कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की ओर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई। इसका परिणाम यह हुआ कि संसाधनों का दबाव बढ़ा और विकास की गति प्रभावित हुई। अब यदि संसाधनों या लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी केवल जनसंख्या के आधार पर की जाती है, तो यह उन राज्यों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने जिम्मेदारी से...