वैर तो मन का होता है, व्यक्ति का नहीं

"वैर तो मन का होता है, व्यक्ति का नहीं"

मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी भूल यह होती है कि वह दूसरों की सोच को अपनी सच्चाई समझ लेता है। मैं किसी को अपना शत्रु नहीं मानता — क्योंकि शत्रुता भीतर की शांति को नष्ट करती है। द्वेष का बीज जब हृदय में पड़ता है, तो सबसे पहले वही हृदय सूखता है जिसमें वह पनपता है। इसलिए मैंने यह ठान लिया है कि मैं किसी के प्रति वैर, ईर्ष्या या दुर्भावना नहीं रखूंगा।

लेकिन यदि कोई मुझे अपना शत्रु मान ले, तो क्या मैं उसके दृष्टिकोण का उत्तरदायी हूं? नहीं। क्योंकि हर व्यक्ति अपने मन के आईने में ही दुनिया देखता है — यदि उस आईने पर राग-द्वेष की धूल जमी हो, तो उसमें किसी की अच्छाई भी धुंधली पड़ जाती है।

मेरे कर्म, मेरे विचार, और मेरा मन यदि निर्मल हैं, तो दूसरों की कटुता से मुझे कोई चोट नहीं लग सकती। जो मुझे अपना शत्रु मानता है, संभव है कि उसके अनुभव, उसकी पीड़ाएँ या उसकी असुरक्षाएँ उसे ऐसा सोचने पर विवश करती हों। मैं केवल इतना कर सकता हूँ कि उसके लिए भी सद्भाव रखूँ — क्योंकि मनुष्य की महानता अपने विरोधियों के प्रति भी शुभेच्छा बनाए रखने में है।

जीवन की यात्रा में सभी लोग अपने-अपने अनुभवों के बोझ के साथ चलते हैं। कोई अपने भय से ग्रसित होकर द्वेष पालता है, कोई अहंकार से, और कोई गलतफहमी से। परंतु जो व्यक्ति आत्मशांत रहता है, वह जानता है कि सच्ची विजय किसी को हराने में नहीं, बल्कि खुद को स्थिर और दयालु बनाए रखने में है।

इसलिए, यदि कोई मुझे शत्रु समझता है, तो यह उसका चुनाव है — मेरा नहीं। मेरा धर्म है कि मैं अपने मन को निर्मल रखूँ, क्योंकि अंततः वही मन मेरा साक्षी भी है और मेरा न्यायाधीश भी।

वैर रखना किसी को छोटा नहीं बनाता, लेकिन वैर छोड़ देना अवश्य किसी को बड़ा बना देता है।

राहुल पांडे अविचल 

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