जनसंख्या आधारित हिस्सेदारी बनाम उत्तरदायित्व आधारित न्याय : निबंध

जनसंख्या आधारित हिस्सेदारी बनाम उत्तरदायित्व आधारित न्याय
राहुल पांडे अविचल 
भूमिका:
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां संसाधनों का वितरण, प्रतिनिधित्व और योजनाएं जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर की जाती हैं। किंतु एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या हिस्सेदारी केवल संख्या बल के आधार पर होनी चाहिए, या फिर उस उत्तरदायित्व के आधार पर जो किसी ने देशहित में निभाया है? यह विचार केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक संसाधनों, योजनाओं और सामाजिक न्याय की संपूर्ण प्रणाली पर प्रभाव डालता है।

मुख्य तर्क:
देश की स्वतंत्रता के समय सभी राज्यों को समान अवसर प्राप्त थे। समय के साथ कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण को प्राथमिकता दी, जागरूकता फैलाई और सीमित संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग किया। वहीं, कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की ओर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई। इसका परिणाम यह हुआ कि संसाधनों का दबाव बढ़ा और विकास की गति प्रभावित हुई।

अब यदि संसाधनों या लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी केवल जनसंख्या के आधार पर की जाती है, तो यह उन राज्यों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने जिम्मेदारी से कार्य किया। यह ठीक वैसा ही है जैसे दो भाइयों में एक ने एक ही बच्चा पैदा किया और दूसरे ने पाँच, तो क्या छह हिस्से बांटे जाएं या जिम्मेदारी के आधार पर वितरण हो?

ऐतिहासिक दृष्टिकोण:
इंदिरा गांधी सरकार के समय 1970 के दशक में नसबंदी अभियान चलाया गया। उसका उद्देश्य था जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण, जिससे देश के सीमित संसाधनों का संतुलित उपयोग संभव हो सके। हालांकि उसे लागू करने के तरीके विवादास्पद रहे, परंतु मूल भावना देशहित की थी। इसी भावना के तहत भारत सरकार ने 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों को 2026 तक "फ्रीज़" किया, जिससे उन राज्यों को दंडित न किया जाए जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई।

संविधान और न्याय की दृष्टि से:
भारतीय संविधान सामाजिक न्याय का समर्थन करता है। सामाजिक न्याय का तात्पर्य यह नहीं कि जो अधिक संख्या में हैं, वे अधिक अधिकार पाएँ, बल्कि इसका मतलब यह है कि जो जिम्मेदारी निभाते हैं, उन्हें न्यायसंगत लाभ मिले। यदि हम केवल जनसंख्या को आधार मानेंगे, तो यह जनसंख्या विस्फोट को परोक्ष रूप से बढ़ावा देने जैसा होगा।

समाधान की दिशा में:

1. संसाधनों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का बँटवारा करते समय जनसंख्या के साथ-साथ जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को भी मान्यता दी जानी चाहिए।

2. ऐसे राज्यों या व्यक्तियों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में अग्रणी भूमिका निभाई है।

3. संविधान में स्थायी आयोग गठित कर जनसंख्या नियंत्रण को एक राष्ट्रीय नीति के रूप में लागू किया जाए।

4. "कर्तव्य आधारित अधिकार" की अवधारणा को सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में स्थान दिया जाए।

उपसंहार:
देश के संसाधन सीमित हैं और जनता की आवश्यकताएं असीमित। ऐसे में यदि हिस्सेदारी केवल जनसंख्या के आधार पर होगी, तो यह न तो न्याय होगा, न ही विकास की राह। सच्चे लोकतंत्र और सामाजिक संतुलन के लिए यह आवश्यक है कि हम संख्या नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व, अनुशासन और योगदान के आधार पर हिस्सेदारी तय करें। यही देशहित में है और यही भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सशक्त भारत की आधारशिला बनेगा।

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