जब हम बिखरते हैं

जब हम बिखरते हैं

राहुल पांडे अविचल 

रिश्ते शायद जीवन की सबसे जटिल, सबसे नाज़ुक और फिर भी सबसे सुंदर संरचनाएँ हैं। ये हमारे अस्तित्व का वह हिस्सा हैं जहाँ मनुष्य अपने अकेलेपन से लड़ना सीखता है, पर अक्सर इन्हीं में सबसे ज़्यादा घायल भी होता है। रिश्ते किसी करार की तरह नहीं निभाए जाते, ये तो एक मौन समझौता होते हैं - दिल और आत्मा के बीच का। कोई लिखित अनुबंध नहीं, कोई कानूनी शर्त नहीं; बस भरोसा, सम्मान और भावना की महीन डोर पर टिका एक संसार। और जब यह डोर थोड़ी भी ढीली पड़ती है, तो भीतर की स्थिरता हिल जाती है।

रिश्तों में सबसे बड़ी भूल तब होती है जब हम यह मान लेते हैं कि सामने वाला हमें वैसे ही समझेगा, जैसे हम खुद को समझते हैं। पर सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति अपनी परिस्थिति, अपने अनुभव और अपने स्वार्थ से देखता है - कोई मन से, कोई दिमाग से, और कोई बस दिखावे से। यही कारण है कि कभी-कभी जिस सच्चाई को हम समर्पण मानते हैं, वही दूसरे के लिए कमजोरी बन जाती है। रिश्तों का यह असंतुलन बड़ा खतरनाक होता है - एक तरफ़ उम्मीदें, दूसरी तरफ़ उपेक्षा; एक तरफ़ निष्ठा, दूसरी तरफ़ नाटकीयता। धीरे-धीरे यह खिंचाव भीतर की शांति को निगलने लगता है।

कभी सोचा है कि रिश्ते टूटते क्यों हैं? ज़्यादातर रिश्ते किसी एक बड़ी घटना से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी अनदेखियों से टूटते हैं। एक दिन संवाद कम होता है, दूसरे दिन संवेदना; और फिर अचानक पता चलता है कि बात तो अब भी चल रही है, पर रिश्ता ख़त्म हो चुका है। कभी-कभी तो रिश्ते दिखते बहुत मज़बूत हैं, पर भीतर से खोखले - जैसे कोई दीवार बाहर से चमकदार और अंदर से दीमक लगी हो। ऐसा तब होता है जब हम रिश्ते को “निभाने” की कोशिश में उसे “जीना” भूल जाते हैं।

और सबसे कठिन क्षण तब आता है जब आप पूरी ईमानदारी से रिश्ता बचाने की कोशिश करें, लेकिन सामने वाला आपको ही दोष देने लगे। वह आपकी चुप्पी को स्वीकृति, आपकी विनम्रता को डर, और आपके समर्पण को निर्बलता समझ ले। उस पल भीतर से कुछ टूट जाता है - शायद भरोसा नहीं, बल्कि वह मासूमियत, जिससे आप किसी को अपना मानते थे। फिर भी मन कहता है, “शायद एक और कोशिश कर लूँ।” लेकिन रिश्ते एकतरफा कोशिशों से नहीं चलते; जब तक दोनों तरफ़ से आत्मा की सच्चाई न हो, तब तक किसी पुल पर चलना केवल एक धोखा होता है - खुद के साथ।

रिश्तों की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है जब मन में दूरी आ जाए और फिर भी आप नफ़रत न कर पाएं। यह वही क्षण होता है जहाँ प्रेम का रूप बदल जाता है - अब उसमें अपेक्षा नहीं रहती, बस एक शांति रहती है कि मैंने अपनी ओर से कोई कमी नहीं छोड़ी। शायद यही वह मोड़ है जहाँ “रिश्ता निभाना” नहीं, बल्कि “रिश्ते से सीखना” शुरू होता है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि कुछ लोग हमारे जीवन में केवल एक अध्याय भर होते हैं, पूरी किताब नहीं, तब मन धीरे-धीरे हल्का होने लगता है।

रिश्ते की खूबसूरती इसमें नहीं कि वह कितना लंबा चला, बल्कि इसमें है कि उसने हमें क्या सिखाया - धैर्य, संवेदना, स्वाभिमान, या फिर यह कि हमें कब छोड़ देना चाहिए। कभी-कभी सबसे बड़ी निष्ठा यह होती है कि हम किसी रिश्ते को वहीं छोड़ दें जहाँ वह अब भी सुंदर दिखता है, क्योंकि उसे घसीटने से बस कड़वाहट ही बढ़ती है।

आख़िर में यही कहूँगा - रिश्ते सांसों की तरह हैं, उन्हें बाँधा नहीं जा सकता। उन्हें बस महसूस किया जा सकता है, अपनापन देकर, सम्मान देकर। और अगर कोई रिश्ता बार-बार आपकी आत्मा को आहत कर रहा है, तो शायद वह रिश्ता नहीं, एक परीक्षा है - यह जानने की कि आप खुद से कितना प्रेम करते हैं। रिश्ते तभी पवित्र रहते हैं जब उनमें “मैं” से ज़्यादा “हम” बचा रहे, और जब “हम” टूट जाए तो कम-से-कम “मैं” तो बचा रहे।

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