एक ही रक्त, दो नियतियाँ — अर्जुन, शिशुपाल और कृष्ण का पारिवारिक सत्य
“एक ही रक्त, दो नियतियाँ — अर्जुन, शिशुपाल और कृष्ण का पारिवारिक सत्य”
राहुल पांडे अविचल
महाभारत केवल युद्ध और नीति का ग्रंथ नहीं, बल्कि पारिवारिक संबंधों, भावनाओं और नियति के ताने-बाने का भी विराट आख्यान है। इसके पात्रों के बीच जो रिश्ते हैं, वे महज रक्त-संबंध नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य, प्रेम, द्वेष और ईर्ष्या के विविध रूपों में अभिव्यक्त मानव स्वभाव की गहराइयों को छूते हैं। अर्जुन, शिशुपाल और कृष्ण — तीनों ऐसे पात्र हैं, जिनके बीच का संबंध इस जटिलता का अनूठा उदाहरण है।
कृष्ण के पिता वासुदेव मथुरा के राजा शूरसेन के पुत्र थे। शूरसेन की दो प्रसिद्ध पुत्रियाँ थीं — कुंती (जिनका वास्तविक नाम पृथा था) और श्रुतश्रवा। कुंती को बाद में निःसंतान राजा कुन्तिभोज ने गोद लिया, जिससे वे ‘कुंती’ कहलाईं, जबकि श्रुतश्रवा का विवाह चेदि राज्य के राजा दमघोष से हुआ, जिनसे उन्हें पुत्र शिशुपाल प्राप्त हुआ। इस प्रकार वासुदेव, कुंती और श्रुतश्रवा तीनों सगे भाई-बहन हुए। अतः अर्जुन, जो कुंती के पुत्र थे, और शिशुपाल, जो श्रुतश्रवा के पुत्र थे — दोनों भगवान कृष्ण के ममेरे/फुफेरे भाई हुए।
अर्थात, जिन तीनों ने महाभारत के इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी — कृष्ण, अर्जुन और शिशुपाल — वे तीनों एक ही वंश परंपरा से जुड़े हुए थे। यह विचार जितना पारिवारिक लगता है, उतना ही प्रतीकात्मक भी। जहाँ अर्जुन ने कृष्ण में अपना सखा, सारथी और मार्गदर्शक पाया, वहीं शिशुपाल ने उनमें प्रतिद्वंद्वी, अपमान का कारण और मृत्यु का दूत देखा। एक ही कुल से उत्पन्न तीनों जीवनपथ धर्म, अधर्म और मोक्ष के तीन छोर बन गए।
शिशुपाल का जन्म चेदि वंश में हुआ था। जन्म के समय उसके शरीर पर तीन नेत्र और चार भुजाएँ थीं, जिससे माता-पिता भयभीत हुए। तभी एक आकाशवाणी हुई कि जो भी व्यक्ति शिशुपाल को गोद में लेकर उसके अतिरिक्त अंगों को सामान्य कर देगा, वही एक दिन उसका वध करेगा। जब बालक शिशुपाल को कृष्ण ने गोद में लिया, तो उसके अंग सामान्य हो गए। यह घटना एक दिव्य संकेत थी कि भाग्य ने पहले ही दोनों के बीच टकराव की दिशा तय कर दी है।
कृष्ण ने शिशुपाल की माता से वचन दिया था कि वे उसके सौ अपराधों तक क्षमा करेंगे। यह वचन केवल पारिवारिक करुणा नहीं, बल्कि एक गहन नैतिक सिद्धांत का प्रतीक था—जहाँ दया और न्याय के बीच की सीमा रेखा स्पष्ट थी। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में जब शिशुपाल ने कृष्ण के विरुद्ध अपशब्द कहे, उन्हें ‘गोप का पुत्र’ कहकर अपमानित किया, और समाज की मर्यादा को लांघ दिया, तब कृष्ण ने धैर्य की सीमा पार होने पर सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया।
वहीं दूसरी ओर अर्जुन का कृष्ण से संबंध एकदम विपरीत दिशा में विकसित हुआ। वह न केवल कृष्ण का प्रिय मित्र था, बल्कि जीवन के प्रत्येक निर्णायक मोड़ पर उसने कृष्ण को अपना पथप्रदर्शक माना। कुरुक्षेत्र के रण में जब अर्जुन संशय और मोह में डूब गया, तब उसी कृष्ण ने गीता के रूप में उसे धर्म, कर्म और आत्मा का अद्भुत बोध कराया। यहाँ वही कृष्ण, जो शिशुपाल के लिए मृत्यु का कारण बने थे, अर्जुन के लिए ज्ञान और मुक्ति का स्रोत बने।
इस दृष्टि से देखा जाए तो अर्जुन और शिशुपाल दोनों कृष्ण के सगे ममेरे/फुफेरे भाई थे, परंतु उनकी नियति एक-दूसरे के विपरीत चली। एक ने कृष्ण के चरणों में अपना कर्तव्य खोजा, दूसरे ने उसी में अपना विरोध। एक को गीता मिली, दूसरे को सुदर्शन। दोनों ने कृष्ण से संबंध पाया, पर एक ने उसे भक्ति में रूपांतरित किया, और दूसरे ने वैर में।
महाभारत का यह पारिवारिक ताना-बाना बताता है कि मनुष्य का जीवन केवल जन्म या वंश से नहीं, बल्कि उसके आचरण, दृष्टि और चुनाव से निर्मित होता है। रक्त-संबंध समान हो सकते हैं, पर दृष्टिकोण भिन्न। अर्जुन और शिशुपाल दोनों कृष्ण के बुआ के बेटे थे — किंतु एक ने कृष्ण को जीवन का सार समझा, दूसरे ने अपने अहंकार की समाप्ति तक उन्हें विरोधी माना। यही विरोध और यही समर्पण — महाभारत के पात्रों को कालजयी बनाता है।
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