ब्रिज कोर्स, PDPET और विशिष्ट बीटीसी :प्राथमिक शिक्षा में PDPET सहित बीएड का भविष्य

ब्रिज कोर्स, PDPET और विशिष्ट बीटीसी :
प्राथमिक शिक्षा में PDPET सहित बीएड का भविष्य

राहुल पांडे अविचल 

तीन अलग-अलग प्रशिक्षण संरचनाएँ—ब्रिज कोर्स, PDPET और विशिष्ट बीटीसी—दिखने में भले ही स्वतंत्र पाठ्यक्रम प्रतीत हों, किंतु उनके भीतर प्रवाहित शैक्षणिक दर्शन एक ही मूल बिंदु से निकलता है : प्राथमिक शिक्षा के लिए एक सक्षम, संवेदनशील, उत्तरदायी और व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित शिक्षक का निर्माण करना। अंतर केवल इस बात का है कि यह लक्ष्य किस गहराई, किस अवधि और किस विधिक-शैक्षणिक मानक के साथ साधा जा रहा है।

ब्रिज कोर्स को यदि गंभीरता से देखा जाए तो यह पूर्ण शिक्षक-प्रशिक्षण नहीं है, बल्कि एक संक्रमणकालीन व्यवस्था है। इसका उद्देश्य उन शिक्षकों को न्यूनतम शैक्षणिक आधार से जोड़ना है जो पहले से सेवा में हैं अथवा किसी कारणवश निर्धारित प्रारंभिक शिक्षक-प्रशिक्षण से वंचित रह गए। बाल विकास, शैक्षिक मनोविज्ञान, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, पाठ्यक्रम-बोध और सीमित विषय-पेडागॉजी इसके केंद्र में हैं। मूल्यांकन संरचना संक्षिप्त है, विषयों की संख्या सीमित है और विद्यालयीय अभ्यास न्यूनतम है। यह पाठ्यक्रम शिक्षक बनने की प्रक्रिया को पूर्ण नहीं करता, बल्कि केवल उस अंतर को भरने का प्रयास करता है जो नीति और व्यवहार के बीच उत्पन्न हुआ। NEP 2020 को भी इसमें शामिल किया गया है। 

PDPET—अर्थात प्रोफेशनल डेवलपमेंट प्रोग्राम फॉर एलिमेंट्री टीचर्स—इसी क्रम में एक कदम आगे दिखाई देता है। यह शिक्षक को न केवल शिक्षण-प्रक्रिया का सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है, बल्कि उसे शिक्षा-नीति, पाठ्यक्रम संरचना, बाल-केंद्रित शिक्षण और समकालीन शैक्षणिक चुनौतियों से परिचित कराता है। PDPET का स्वरूप अपेक्षाकृत अधिक वैचारिक और अकादमिक है। यह सेवा में कार्यरत शिक्षकों की पेशेवर समझ को परिष्कृत करता है, किंतु यह भी पूर्ण शिक्षक-प्रशिक्षण का स्थान नहीं लेता। विषय-विशेष की गहन पेडागॉजी और दीर्घकालिक विद्यालय अनुभव का अभाव इसमें स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसके बावजूद यदि इसे विशिष्ट बीटीसी और डीएलएड का समकक्ष मान लिया जाए तो निजी प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत बीएड योग्यताधारी PDPET प्रशिक्षुओं अर्थात शिक्षक शिक्षिकाओं को सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक बनने का अवसर प्राप्त हो सकेगा।

इसके विपरीत विशिष्ट बीटीसी अथवा प्रशिक्षु शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शिक्षक-निर्माण की संपूर्ण अवधारणा प्रस्तुत करता था। यह पाठ्यक्रम केवल यह नहीं सिखाता कि कैसे पढ़ाना है, बल्कि यह भी विकसित करता है कि शिक्षक होना क्या है। बाल मनोविज्ञान से लेकर भाषा, गणित, पर्यावरण अध्ययन, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, कला एवं कार्य-शिक्षा तथा स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा तक—प्राथमिक शिक्षा के प्रत्येक आवश्यक घटक को इसमें व्यवस्थित रूप से शामिल किया गया था। सैद्धांतिक अध्ययन के साथ-साथ विस्तृत विद्यालय अनुभव, शिक्षण अभ्यास, मूल्यांकन की प्रक्रिया और श्रेणी निर्धारण इसे एक व्यावहारिक, अनुशासित और पूर्ण शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रम बनाते थे। दिनांक 23 अगस्त 2010 के बाद यह कोर्स बंद कर दिया गया लेकिन जो इस कोर्स में दाखिला ले चुके थे या इसके विज्ञापन में आवेदन करके चयन पा चुके थे उनका प्रशिक्षण पूरा कराया गया और वह दो वर्षीय डीएलएड कोर्स के समकक्ष हैं। इसके अलावा दिनांक 31 मार्च 2014 के पूर्व जारी विज्ञापन से बीएड वालों की जो नियुक्तियां प्राथमिक विद्यालयों में हुई उनको प्रारंभिक शिक्षाशास्त्र के रूप में SBTC के पाठयक्रम से ही प्रशिक्षु शिक्षक के रूप में प्रशिक्षित किया गया। 

तीनों पाठ्यक्रमों में समानता इस बात की है कि वे बाल-केंद्रित शिक्षा, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया और शिक्षक की पेशेवर भूमिका को स्वीकार करते हैं। बाल विकास, पाठ्यक्रम-बोध और पेडागॉजी—ये तीनों के साझा स्तंभ हैं। तीनों इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि प्राथमिक शिक्षा केवल विषय-ज्ञान नहीं, बल्कि बच्चे की संपूर्ण समझ और संवेदनशील मार्गदर्शन की प्रक्रिया है।
किंतु अंतर वहीं से प्रारंभ होता है जहाँ दायरा और दायित्व बदलते हैं।
जहाँ ब्रिज कोर्स न्यूनतम वैधानिक आवश्यकता की पूर्ति करता है,
PDPET शिक्षक के वैचारिक और पेशेवर विकास पर केंद्रित है,
और विशिष्ट बीटीसी शिक्षक-प्रशिक्षण का पूर्ण, गहन और मानक स्वरूप प्रस्तुत करता है।
इसी कारण विधिक और नीतिगत दृष्टि से भी विशिष्ट बीटीसी को प्रायः आधारभूत और मानक शिक्षक-प्रशिक्षण माना गया है। ब्रिज कोर्स और PDPET सहायक तथा पूरक हो सकते हैं, किंतु वे विशिष्ट बीटीसी के प्रतिस्थापक नहीं हो सकते। यह भेद समझना आवश्यक है, क्योंकि शिक्षा केवल कक्षा में खड़े होकर पाठ पढ़ा देने का नाम नहीं है; वह एक अनुशासित, दीर्घकालिक और उत्तरदायित्वपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया है, जिसकी नींव मजबूत प्रशिक्षण पर ही टिकी होती है।
प्राथमिक शिक्षा में बीएड का भविष्य इसी संतुलन पर निर्भर करता है कि हम संक्रमणकालीन व्यवस्थाओं को स्थायी समाधान मान लें। जबकि नीति का उद्देश्य सुविधा नहीं, गुणवत्ता होना चाहिए। शिक्षक की नियुक्ति प्रक्रिया जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसका प्रशिक्षण-चरित्र है। और यह चरित्र तभी बनता है, जब प्रशिक्षण केवल औपचारिकता न होकर शिक्षक-निर्माण का सच्चा माध्यम बने। विशिष्ट बीटीसी डीएलएड के समकक्ष है और ब्रिज कोर्स और छः महीने का PDPET कोर्स भी यदि डीएलएड के समकक्ष हो जायेगा तो छः महीने का PDPET कोर्स कर चुके बीएड योग्यताधारियों के लिए प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक बनने का सुनहरा अवसर होगा। 

— राहुल पांडे ‘अविचल’

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