सुरों में ढला प्रेम: आशा भोसले और राहुल देव वर्मन की अनंत कहानी

सुरों में ढला प्रेम: आशा भोसले और राहुल देव वर्मन की अनंत कहानी

राहुल पांडे अविचल 

स्वर जब शब्दों से आगे निकल जाता है, तब वह इतिहास बनता है और जब इतिहास भी किसी आवाज़ के सामने छोटा लगने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि वह आवाज़ आशा भोसले की है।

वह सिर्फ एक गायिका नहीं रहीं; वह समय की धड़कनों को अपनी आवाज़ में कैद कर लेने वाली एक जीवित परंपरा हैं। 8 सितम्बर 1933 को जन्मी आशा भोसले, उस घराने से आईं जहाँ संगीत सांसों में घुला हुआ था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर स्वयं एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायक और रंगकर्मी थे। लेकिन नियति ने बचपन में ही उनका हाथ छुड़ा लिया। पिता के निधन के बाद, जिम्मेदारियों का भार कम उम्र के कंधों पर आ गिरा और शायद यहीं से वह आवाज़ जन्मी, जिसमें संघर्ष की तपिश और जीवन की जिजीविषा दोनों एक साथ सुनाई देती हैं।

जहाँ एक ओर उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ने शास्त्रीयता और मर्यादा की ऊँचाइयों को छुआ, वहीं आशा भोसले ने उन राहों को चुना, जिन पर चलना जोखिम भरा था- कभी कैबरे, कभी ग़ज़ल, कभी लोक, कभी पॉप, और कभी वह दर्द जिसे शब्दों में कहना आसान नहीं होता।

उनकी आवाज़ में एक अजीब सी शरारत भी है और उतनी ही गहराई भी, जैसे कोई नदी, जो कभी खिलखिलाकर बहती है, और कभी अपने भीतर गहराइयों का अंधकार समेट लेती है।

जीवन का निजी पक्ष भी कम जटिल नहीं रहा। कम उम्र में विवाह, फिर अलगाव, यह सब किसी भी स्त्री को तोड़ सकता था। लेकिन आशा भोसले टूटी नहीं, उन्होंने खुद को नए सिरे से गढ़ा।

फिर एक मोड़ आया, जहाँ संगीत ने प्रेम का रूप लिया और प्रेम ने संगीत को नई ऊँचाइयाँ दीं। यह मोड़ था राहुल देव वर्मन का।

राहुल देव वर्मन, जिन्हें दुनिया प्यार से पंचम दा कहती है, केवल एक संगीतकार नहीं थे, वे धुनों के जादूगर थे। जब उनकी मुलाकात आशा भोसले से हुई, तब दोनों अपने-अपने संघर्षों और अनुभवों के साथ जीवन के एक ऐसे मोड़ पर खड़े थे, जहाँ समझ ही सबसे बड़ा सहारा होती है।

यह संबंध सिर्फ व्यक्तिगत नहीं था- यह रचनात्मकता का विस्फोट था।

“पिया तू अब तो आजा”, “दम मारो दम”, “चुरा लिया है तुमने जो दिल को”- ये केवल गीत नहीं हैं, यह उस रसायन के प्रमाण हैं, जो आशा और पंचम दा के बीच बहता था। पंचम दा ने आशा जी की आवाज़ में वह आयाम खोजे, जिन्हें शायद दुनिया ने पहले कभी सुना ही नहीं था और आशा जी ने उनकी धुनों में वह आत्मा भरी, जो उन्हें अमर बना गई।

उनका रिश्ता समाज की पारंपरिक परिभाषाओं से परे था, वहाँ उम्र का अंतर भी था, जीवन के अनुभवों का अंतर भी, लेकिन इन सबके बीच जो था, वह था एक गहरा विश्वास और एक-दूसरे की कला के प्रति सम्मान।

1980 में दोनों ने विवाह किया, लेकिन यह विवाह किसी नई शुरुआत से अधिक, एक लंबे साथ का औपचारिक स्वीकार था।

पंचम दा के जीवन में उतार-चढ़ाव आए। कभी वह समय भी आया जब उनका संगीत उतना नहीं चला जितना पहले चलता था। लेकिन आशा भोसले उस समय भी उनके साथ खड़ी रहीं, जैसे कोई दीपक, जो आँधी में भी बुझने से इंकार कर देता है।

1994 में जब पंचम दा इस दुनिया से विदा हुए, तब यह केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था। यह आशा भोसले के जीवन से एक पूरा युग चला गया। लेकिन उन्होंने उस शून्य को भी अपनी आवाज़ में समेट लिया।

शायद यही कारण है कि उनके गाए हुए गीतों में एक अजीब सी सच्चाई होती है। वह सच्चाई जो केवल वही महसूस कर सकता है, जिसने जीवन को हर रंग में जिया हो।

आशा भोसले की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने खुद को कभी एक दायरे में सीमित नहीं किया। उन्होंने हर उस शैली को अपनाया, जिसे समाज ने कभी ‘हल्का’ कहा, और उसे भी उतनी ही गरिमा दी जितनी किसी शास्त्रीय रचना को दी जाती है।

वह एक ऐसी स्त्री की कहानी हैं, जिसने समाज की सीमाओं को चुनौती दी, अपने निर्णय खुद लिए, अपने घाव खुद सहे, और फिर भी मुस्कुराते हुए गाती रहीं।

उनकी आवाज़ में जो खनक है, वह केवल सुरों की नहीं है। वह आत्मविश्वास की है, वह उस स्त्री की है जिसने यह साबित किया कि जीवन चाहे जितनी बार परीक्षा ले, यदि भीतर जिजीविषा बची हो, तो हर बार एक नया गीत जन्म ले सकता है।

और शायद यही कारण है कि जब भी कोई उनका गीत सुनता है, तो उसे केवल संगीत नहीं सुनाई देता, उसे एक पूरा जीवन सुनाई देता है, जिसमें प्रेम भी है, पीड़ा भी, विद्रोह भी, और एक अडिग मुस्कान भी।

मेरे दादा ने मेरे पिता जी का नाम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता गुरुदत्त के नाम पर रखा था तो मेरे पिता जी ने मेरा नाम पंचम दा के नाम पर राहुल रखा था। इसलिए आशा ताई के परलोक गमन पर मन बहुत दुखी है लेकिन मृत्यु ही अंतिम सत्य है। 

विनम्र श्रद्धांजलि आशा ताई ...

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