सियासत में ओपी राजभर और संजय निषाद के मायने

सियासत में ओपी राजभर और संजय निषाद के मायने 

राहुल पांडे 'अविचल'

उत्तर प्रदेश की सियासत में ओपी राजभर और संजय निषाद की भूमिका एक समुदाय तक सीमित है। राजनैतिक विश्लेषक कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति से जातिवाद खत्म हो गया है जबकि ओपी राजभर, संजय निषाद और पटेल बहनों की सफलता ने एक नए विश्लेषण को जन्म दिया है। जेएच हट्टन की समिति ने कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिंद, भर, राजभर, धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिया, मांझी व मछुआ को अछूत न मानते हुए इन्हें अनुसूचित जाति में शामिल नहीं किया था। आजादी के बाद कुछ समय तक इन्हें अनुसूचित जाति का लाभ मिला परंतु बाद में अनुसूचित जाति से हटा दिया गया। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम के करीबी ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व में इन जातियों ने संघर्ष किया और ओबीसी आरक्षण लागू होने के बाद वर्ष 1997 में इन्हें ओबीसी में शामिल कर लिया गया। ओबीसी की सबल जातियों के कारण इन जातियों को ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका। जिसके कारण ओम प्रकाश राजभर ने इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की मांग करना शुरू कर दिया। संजय कुमार निषाद ने निषादों के पक्ष में कई किताबें लिखी और इन्हें अनुसूचित जाति के अन्तर्गत बताया। संविधान में मछुआ मझवार को स्पष्ट करने की मांग की। बसपा सरकार इन सत्रह जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल न करती क्योंकि इससे जाटव सहित दलित जातियां नाराज हो जातीं इसलिए ओम प्रकाश राजभर ने बसपा से अलग होकर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी बना लिया। ओम प्रकाश राजभर ने इन सत्रह जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कराने का बीड़ा उठाया। समाजवादी पार्टी की सरकार ने इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किया परंतु उच्च न्यायालय ने सरकार के फैसले पर रोक लगा दिया। बहुजन समाज पार्टी ने पुनः ओबीसी में शामिल कर दिया। समाजवादी पार्टी ने पुनः अनुसूचित जाति में शामिल किया लेकिन उच्च न्यायालय ने पुनः रोक लगा दिया परंतु बाद में अनुसूचित जाति का अंतरिम जाति प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश जारी कर दिया। वर्ष 2012 के चुनाव में जहूराबाद से लगभग पचास हजार वोट पाकर ओम प्रकाश राजभर ने अपनी पार्टी का जनाधार दिखाया। जब वर्ष 2017 का चुनाव लड़ने के लिए बीजेपी के चाणक्य अमित शाह उत्तर प्रदेश आये तो छोटे-छोटे दलों से गठबंधन करने का निर्णय लिया और उनकी नजर ओम प्रकाश राजभर पर पड़ी। ओम प्रकाश राजभर ने सत्रह जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग की जिसे अमित शाह ने सामाजिक न्याय समिति का गठन कर ओबीसी में विभाजन के रूप में लागू करने का आश्वासन दिया। इस तरह ओम प्रकाश राजभर अमित शाह के सुझाव पर इन सत्रह जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग को भुलाकर ओबीसी वर्ग में कोटा अथवा विभाजन के लिए तैयार हो गए। सत्रह जातियां भी बहुत खुश हुईं और उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार आ गयी। ओम प्रकाश राजभर मंत्री बने और प्रतिदिन इन सत्रह जातियों का मुद्दा उठाते। दूसरी तरफ़ संजय निषाद इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग करते रहे। संजय निषाद के पुत्र ने सपा के टिकट से  गोरखपुर उप चुनाव में भाजपा को परास्त कर दिया। वह कहते कि उनके बड़े भाई ओम प्रकाश राजभर अमित शाह के कहने पर मुद्दे से भटक गए हैं। सामाजिक न्याय समिति का गठन हुआ। कमेटी की रिपोर्ट भी आई परंतु लोकसभा चुनाव 2019 के पहले लागू नहीं हुई। जिसपर ओम प्रकाश राजभर ने प्रदेश सरकार से इस्तीफा दे दिया और आरोप लगाया कि अनुप्रिया पटेल के दबाव में अमित शाह कमेटी की रिपोर्ट लागू नहीं कर रहे हैं। ओम प्रकाश राजभर के अलग होते ही संजय निषाद बीजेपी से मिल गए। उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश पर सत्रह जातियों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी करने का निर्णय लिया। संजय निषाद के पुत्र प्रवीण निषाद संतकबीरनगर से बीजेपी के सांसद बन गए। माननीय उच्च न्यायालय ने सत्रह जातियों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी करने पर रोक लगा दी। इस पर संजय निषाद ने भरोसा दिलाया कि संसद से इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कराया जाएगा। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन करके छः शीट जीत लिया। भाजपा से गठबंधन करके निषाद पार्टी ने भी छः शीट पर विजय प्राप्त किया। इस तरह से इन 17 जातियों के दो चर्चित नेताओं ने 12 शीट प्राप्त कर लिया। बीजेपी को भरोसा था कि समाजवादी पार्टी का कोर वोटर ओम प्रकाश राजभर को पसंद नहीं करेगा। क्योंकि वह बीजेपी के सुझाव पर सत्रह जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग छोड़कर अब ओबीसी में विभाजन की मांग करने लगे हैं। चुनाव में कहीं भी इन सत्रह जातियों के आरक्षण के मुद्दे को ओम प्रकाश राजभर द्वारा उठाया ही नहीं गया। जबकि संजय निषाद हर जनसभा में यह मुद्दा उठाते थे कि चुनाव बाद इन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त हो जाएगा। यदि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व इन जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं मिला तो संजय निषाद से इन जातियों का मोह भंग हो सकता है। ओम प्रकाश राजभर तभी बीजेपी के साथ जाएंगे जब सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट बीजेपी लागू करेगी। यह भी सम्भव है कि ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद दोनों को अपने पक्ष में करने के लिए बीजेपी सत्रह जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा प्रदान करे। वर्तमान समय में बीजेपी के साथ यह भी धर्मसंकट है कि वह सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट लागू करके क्या अनुप्रिया पटेल को नाराज करने का जोखिम उठा सकती है? अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद और ओपी राजभर तीनों को एक साथ  साधने के लिए इन सत्रह जातियों को क्या अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाएगा? बसपा के मतों में सेंध लगाने में सफल बीजेपी इन सत्रह जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के पूर्व भी गंभीर विचार अवश्य करेगी क्योंकि सत्रह जातियों को शामिल करते ही दलित समुदाय का नाराज होना तय है। इन सबके बावजूद यह तय है कि अनुप्रिया पटेल , ओपी संजय और दलित मतदाताओं में किसी एक को वर्ष 2024 के पूर्व बीजेपी से शिकायत हो सकती है। यह अलग विषय है कि बदलते राजनैतिक माहौल में यह बीजेपी के लिए फायदे का सौदा सिद्ध हो।

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