उत्तर के जोशी से दक्षिण के जोशी तक: भाजपा के शिक्षा मंत्रियों का सफर

उत्तर के जोशी से दक्षिण के जोशी तक: भाजपा के शिक्षा मंत्रियों का सफर

राहुल पांडे अविचल 

भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय तक एक ऐसी दिशा में चली जिसमें राष्ट्रीय गौरव, सांस्कृतिक जड़ों और ऐतिहासिक सत्य को हाशिए पर धकेल दिया गया था। स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक वामपंथी इतिहासकारों और विचारधाराओं का गहरा प्रभाव रहा। पाठ्यपुस्तकों में भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक योगदान, प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों और राष्ट्रीय आंदोलन के व्यापक स्वरूप को या तो कम करके आंका गया या विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया। इसी पृष्ठभूमि में भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय शिक्षा मंत्रियों ने शिक्षा को फिर से राष्ट्र के केंद्र में लाने का प्रयास किया। उत्तर प्रदेश के डॉ. मुरली मनोहर जोशी से लेकर कर्नाटक के प्रह्लाद जोशी तक, यह सफर केवल मंत्रियों के बदलने का नहीं, बल्कि एक वैचारिक संघर्ष और सुधार का सफर रहा है।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी का कार्यकाल अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का सबसे यादगार अध्याय है। उन्होंने शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की दिशा में संवैधानिक संशोधन की नींव रखी। सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत उनके कार्यकाल की बड़ी उपलब्धि रही। लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहन, संस्कृत और भारतीय भाषाओं का महत्व, मदरसों के आधुनिकीकरण के साथ-साथ उर्दू शिक्षा को भी संसाधन दिए गए। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2000 उनके नेतृत्व में आई। इसमें मूल्य शिक्षा, मौलिक कर्तव्यों और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को जगह दी गई। विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ दूरस्थ शिक्षा और संसाधनों के साझा उपयोग पर जोर दिया गया। साक्षरता दर बढ़ाने और निरक्षरों की संख्या घटाने में ठोस प्रगति हुई।

सबसे महत्वपूर्ण कार्य था इतिहास और सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में व्याप्त विकृतियों को सुधारना। वामपंथी इतिहासकारों की रचनाओं में वैदिक काल को पिछड़ा बताने, गाय और मांस संबंधी अतिरंजित दावों, मध्यकालीन आक्रमणों को नरम रूप में पेश करने और राष्ट्रीय आंदोलन में कुछ संगठनों की भूमिका को नजरअंदाज करने जैसी बातें प्रमुख थीं। जोशी ने इन अंशों को हटाया या संशोधित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ऐतिहासिक तथ्यों को पढ़ाना भगवाकरण नहीं है। राष्ट्रीय एकता और धार्मिक सद्भाव को ध्यान में रखते हुए उन हिस्सों को निकाला गया जो किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाते थे। इस प्रयास का विरोध भी हुआ। वामपंथी बुद्धिजीवियों और विपक्षी दलों ने भगवाकरण का आरोप लगाया। संस्थानों में नियुक्तियों को लेकर विवाद खड़े किए गए। फिर भी जोशी अडिग रहे। उन्होंने कहा कि शिक्षा को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखना जरूरी है, न कि किसी विदेशी या वैचारिक चश्मे से।

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में स्मृति ईरानी ने शिक्षा मंत्रालय संभाला। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति की प्रक्रिया शुरू की। स्वयम प्लेटफॉर्म के माध्यम से ऑनलाइन शिक्षा को विस्तार दिया। राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की पहल शुरू हुई। चुनौतियां कम नहीं थीं। विश्वविद्यालय स्तर पर सुधारों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए। शिक्षा को रोजगार और कौशल से जोड़ने की कोशिशों को पुरानी सोच वाले हलकों से प्रतिरोध मिला। फिर भी उन्होंने शिक्षा को डिजिटल युग के अनुरूप बनाने की नींव रखी।

प्रकाश जावड़ेकर के कार्यकाल में दीक्षा प्लेटफॉर्म आया। डिजिटल कक्षाओं और शोध को बढ़ावा मिला। पाठ्यक्रम को तर्कसंगत बनाने और भार कम करने के प्रयास हुए। रमेश पोखरियाल निशंक के समय राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को मंजूरी मिली। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय रखा गया। यह बदलाव केवल नाम का नहीं था। यह शिक्षा को फिर से उसके मूल उद्देश्य की ओर लौटाने का प्रतीक था। नीति में बहुभाषीय शिक्षा, कौशल विकास, भारतीय ज्ञान प्रणाली, बहुविषयक अध्ययन और लचीलेपन पर जोर दिया गया।

धर्मेंद्र प्रधान वर्तमान में इस नीति को जमीन पर उतारने का कार्य किए। पीएम श्री स्कूल, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा का क्रियान्वयन, क्रेडिट बैंक, अनुसंधान कोष और डिजिटल शिक्षा का विस्तार उनके कार्यकाल की विशेषता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को शिक्षा में शामिल करने की दिशा में भी काम चल रहा है। चुनौतियां भी सामने आईं। परीक्षा प्रणाली में खामियां, पेपर लीक की घटनाएं और छात्रों के आक्रोश ने व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया। अंततः धर्मेंद्र प्रधान ने त्यागपत्र दे दिया। क्योंकि इनके इस्तीफे की मांग के आड़ में जिनका इनके त्यागपत्र से कोई फायदा नहीं था वह भी राजनैतिक रोटियां सेंकना चाहते थे। आंदोलन के मंच पर ऐसे लोगों ने भी उपस्थिति दर्ज कराई जो कि स्वयं को देश की नजर में लाना चाहते थे। जैसे LGBTQ, वामपंथी, मेरा लिंग मेरी मर्जी आदि का अभियान भी जोरों पर था। 

शिक्षा के सुधार में बीजेपी के शिक्षा मंत्रियों का सराहनीय प्रयास रहा है। वामपंथी इतिहास लेखन में जो विकृतियां थीं, उन्हें सुधारने की कोशिश। प्राचीन भारत की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों को जगह दी गई। मुगल काल और मध्यकाल को एकतरफा महिमामंडित करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगा। स्वतंत्रता संग्राम के उन नायकों को सामने लाया गया जिन्हें लंबे समय तक उपेक्षित रखा गया था। भारतीय ज्ञान परंपरा, योग, आयुर्वेद और स्थानीय भाषाओं को पाठ्यक्रम में सम्मानजनक स्थान मिला। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्पष्ट रूप से कहा गया कि शिक्षा को भारत की जड़ों से जोड़ना है। छात्रों में राष्ट्र के प्रति गौरव जगाना है।

प्रह्लाद जोशी कर्नाटक से आते हैं। जोशी जी को शिक्षामंत्री का अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है तो उत्तर के जोशी से दक्षिण के जोशी तक का बीजेपी के शासन में शिक्षामंत्रियों का दौर कहा जा सकता है , आशा है कि भविष्य में हम यह लिख सकेंगे कि जोशी जी भाजपा की उस वैचारिक धारा के प्रतिनिधि हैं जो उत्तर से दक्षिण तक फैली हुई है। दक्षिण भारत में भी शिक्षा को सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने के प्रयासों में ऐसे नेताओं की भूमिका रही है। उत्तर के जोशी ने जो बीज बोया, उसे बाद के मंत्रियों ने सींचा और दक्षिण के जोशी जैसे नेताओं ने उस विचारधारा को पूरे देश में मजबूत किया।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी से प्रारंभ हुआ यह वैचारिक और नीतिगत सफर आज प्रह्लाद जोशी तक पहुंचा है। इस दौरान शिक्षा नीति, डिजिटल शिक्षा, भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा आधारित शिक्षण और पाठ्यक्रम सुधार जैसे अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इन सुधारों का मूल्यांकन समय करेगा, किंतु इतना निश्चित है कि शिक्षा को लेकर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा बदल चुकी है। अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, शोध की गुणवत्ता और समान अवसरों को सुनिश्चित करते हुए भारत की शिक्षा व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जाए। यदि वर्तमान नेतृत्व इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान कर सका, तो शिक्षा वास्तव में राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम बन सकती है।

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