पुण्यभूमि पट्टी का राजनैतिक इतिहास

पट्टी का राजनैतिक इतिहास

राहुल पांडे 'अविचल' 

स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में पट्टी ने खुद को अजर-अमर बनाया है। बाबा रामचंदर, झिंगुरी सिंह, भगवान दीन पटेल, करिया कुर्मी, श्याम सुंदर शुक्ल, मुनीश्वर दत्त उपाध्याय, राजेश्वर सहाय त्रिपाठी, राम राज शुक्ल की पावन धरती पट्टी  आकर स्वतंत्रता संग्राम के सुकुमार नायक पंडित जवाहर लाल नेहरू ने राजनीति का ककहरा सीखा था। रहठे से बने झौवे पर बैठकर उन्होंने अपने जीवन का ऐतिहासिक भाषण दिया था। लियाकत अली से वर्ष 1921 में प्रभावित होकर श्याम सुंदर शुक्ल ने दरोगा की नौकरी छोड़ दी थी और जनपद के कांग्रेस पार्टी के प्रथम अध्यक्ष बने थे। जब देश को दिनांक 15 अगस्त 1947 की रात्रि 12 बजे आजाद होना था तो श्याम सुंदर शुक्ल और मुनीश्वर दत्त उपाध्याय ने रात्रि 11 बजे ही कलेक्ट्रेड में लगे यूनियन जैक को फाड़कर फेंक दिया था। यूनाइटेड प्रोविन्स के बाद उत्तर प्रदेश बने राज्य में पट्टी विधानसभा का अस्तित्व वर्ष 1957 में आया। मगर यह शीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। वर्ष 1957 में बाबू रामकिंकर ने कांग्रेस पार्टी से प्रथम विधायक बनने का गौरव प्राप्त किया। वर्ष 1962 में बीरापुर एक और विधानसभा बन गयी तथा श्याम सुंदर शुक्ल बीरापुर के प्रथम विधायक बने परन्तु वर्ष 1967 में रामदेव दुबे से चुनाव हारकर उन्होंने राजनीति को अलविदा कह दिया। वर्ष 1969 में इंदिरा गांधी ने श्याम सुंदर शुक्ल से बहुत निवेदन किया मगर वह राजनीति में वापस नहीं लौटे। बाबू रामकिंकर वर्ष 1962 में भी पट्टी के विधायक बने। वर्ष 1967 का चुनाव जीतकर बाबू रामकिंकर ने जीत की हैट्रिक लगायी। वर्ष 1962 में ही पट्टी विधानसभा का भूभाग प्रतापगढ़ संसदीय क्षेत्र से कटकर मछलीशहर संसदीय क्षेत्र में जुड़ गया। वर्ष 1969 में कांग्रेस ने बाबू रामकिंकर का टिकट काट दिया तो बाबू रामकिंकर बीकेडी से टिकट लेकर पट्टी के लगाकर चौथी बार विधायक बने। वर्ष 1974 में पट्टी विधानसभा की शीट अनारक्षित हो गयी तो राजा दिनेश सिंह ने इलाहाबाद से लाकर प्रभाकर नाथ द्विवेदी को पट्टी विधानसभा का चुनाव लड़वाया और प्रभाकर नाथ द्विवेदी विजयी रहे। वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव में राजपति मिश्र जनता पार्टी से पट्टी के विधायक बने। वर्ष 1980 के विधानसभा चुनाव में प्रोफेसर वासुदेव सिंह पट्टी के विधायक बने। उन्होंने सहकारिता मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष के रूप में पट्टी के गौरव को स्वर्णिम आकाश तक पहुंचाया। हिंदी भाषा को लेकर उन्होंने मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र और विश्वनाथ प्रताप सिंह से टकराने में तनिक भी संकोच नहीं किया। वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में प्रोफेसर वासुदेव सिंह पुनः कांग्रेस पार्टी से पट्टी के विधायक बने। अफसोस वर्ष 1987 में प्रोफेसर वासुदेव सिंह का निधन हो गया। वर्ष 1987 में पट्टी विधानसभा का उपचुनाव हुआ। बारडीह के ऊसर में कांशीराम ने ऐतिहासिक रैली किया तो उस रैली को धूमिल करने के लिए मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह ने बारडीह के ऊसर में हेलीकॉप्टर रैली किया। हेलीकॉप्टर देखने की भीड़ ने कांशीराम की रैली को पीछे छोड़ दिया। वर्ष 1987 के उपचुनाव में राजा अजीत प्रताप सिंह कांग्रेस पार्टी से विजयी रहे और सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्री बने। वर्ष 1989 के विधानसभा चुनाव में लमलखन यादव ने जनतापार्टी के टिकट से पट्टी का विधायक बनने का गौरव हासिल किया। रामबोध पाण्डेय ने भारतीय जनता पार्टी को अपने खून पसीने से सींचा मगर वर्ष 1991 का चुनाव प्रोफेसर शिवाकांत ओझा ने लड़ा और बीजेपी प्रत्याशी के रूप में विजयी रहे। वर्ष 1993 में कांशीराम और मुलायम सिंह के मध्य गठबंधन के कारण समाजवादी पार्टी से रामलखन यादव पट्टी के विधायक बने। वर्ष 1996 में शिवाकांत ओझा बीरापुर चले गए और कांग्रेस पार्टी से आकर राजेन्द्र प्रताप सिंह मोती सिंह ने भाजपा का दामन थाम लिया और विधानसभा चुनाव में विजयी रहे। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में राजेंद्र प्रताप सिंह मोती सिंह पुनः बीजेपी के टिकट से विजयी रहे तथा प्रदेश सरकार में कृषि राज्य मंत्री बने। वर्ष 2007 का चुनाव बसपा से शक्ति सिंह तथा सपा से बालकुमार पटेल ने लड़ा। राजेंद्र प्रताप सिंह मोती सिंह ने बीजेपी के टिकट से जीत की हैट्रिक लगाई। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव से विधानसभा क्षेत्र पट्टी संसदीय क्षेत्र मछलीशहर से कटकर संसदीय क्षेत्र प्रतापगढ़ में शामिल हो चुका है। वर्ष 2012 का विधानसभा चुनाव जीतकर राजेन्द्र प्रताप सिंह मोती सिंह बाबू रामकिंकर के रिकॉर्ड की बराबरी कर सकते थे मगर पट्टी की जनता ने 156 वोट से समाजवादी पार्टी के रामसिंह पटेल को विजयी बना दिया। वर्ष 2017  के विधानसभा चुनाव में राजेंद्र प्रताप सिंह मोती सिंह विजयी होकर प्रदेश सरकार में मंत्री बने। वर्ष 2022 का चुनाव प्रगति पर है।

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