ईरान-इज़रायल युद्ध और भारत की राह: दिल और दिमाग के बीच फंसी एक राष्ट्रनीति लेखक: राहुल पांडे 'अविचल' जब दो राष्ट्र युद्ध की आग में झुलस रहे हों, तब केवल तलवार नहीं, विवेक भी बोलता है। ईरान और इज़रायल के बीच उठती यह ज्वाला न सिर्फ पश्चिम एशिया, बल्कि भारत के दिल और सोच को भी झकझोर रही है। भारत आज एक कठिन मोड़ पर खड़ा है — एक ओर इज़रायल है, जो वर्षों से भारत का रक्षा साथी रहा है, जिसने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहने की मिसाल दी है। दूसरी ओर ईरान है, हमारी ऊर्जा का स्रोत, हमारी संस्कृति का साझेदार और चाबहार बंदरगाह जैसा रणनीतिक सहयोगी। लेकिन सिर्फ बाहर की दुनिया नहीं, भारत का मन भी दो खेमों में बँटा है। कुछ लोग इज़रायल के साहस और निर्णायक कार्रवाई के प्रशंसक हैं, तो कुछ ईरान को साम्राज्यवाद के खिलाफ एक प्रतिरोध की आवाज़ मानते हैं। तो भारत को क्या करना चाहिए? भारत को भावनाओं से नहीं, बुद्धिमत्ता से चलना होगा। हमें युद्ध नहीं, शांति का पक्ष लेना चाहिए। हमें किसी की आँधी में उड़ने के बजाय अपना संतुलन साधना होगा — जहाँ इज़रायल से हमारी रक्षा की दीवार मज़बूत ह...
ब्रिज कोर्स, PDPET और विशिष्ट बीटीसी : प्राथमिक शिक्षा में PDPET सहित बीएड का भविष्य राहुल पांडे अविचल तीन अलग-अलग प्रशिक्षण संरचनाएँ—ब्रिज कोर्स, PDPET और विशिष्ट बीटीसी—दिखने में भले ही स्वतंत्र पाठ्यक्रम प्रतीत हों, किंतु उनके भीतर प्रवाहित शैक्षणिक दर्शन एक ही मूल बिंदु से निकलता है : प्राथमिक शिक्षा के लिए एक सक्षम, संवेदनशील, उत्तरदायी और व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित शिक्षक का निर्माण करना। अंतर केवल इस बात का है कि यह लक्ष्य किस गहराई, किस अवधि और किस विधिक-शैक्षणिक मानक के साथ साधा जा रहा है। ब्रिज कोर्स को यदि गंभीरता से देखा जाए तो यह पूर्ण शिक्षक-प्रशिक्षण नहीं है, बल्कि एक संक्रमणकालीन व्यवस्था है। इसका उद्देश्य उन शिक्षकों को न्यूनतम शैक्षणिक आधार से जोड़ना है जो पहले से सेवा में हैं अथवा किसी कारणवश निर्धारित प्रारंभिक शिक्षक-प्रशिक्षण से वंचित रह गए। बाल विकास, शैक्षिक मनोविज्ञान, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, पाठ्यक्रम-बोध और सीमित विषय-पेडागॉजी इसके केंद्र में हैं। मूल्यांकन संरचना संक्षिप्त है, विषयों की संख्या सीमित है और विद्यालयीय अभ्यास न्यूनतम है। यह प...
उत्तर के जोशी से दक्षिण के जोशी तक: भाजपा के शिक्षा मंत्रियों का सफर राहुल पांडे अविचल भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय तक एक ऐसी दिशा में चली जिसमें राष्ट्रीय गौरव, सांस्कृतिक जड़ों और ऐतिहासिक सत्य को हाशिए पर धकेल दिया गया था। स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक वामपंथी इतिहासकारों और विचारधाराओं का गहरा प्रभाव रहा। पाठ्यपुस्तकों में भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक योगदान, प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों और राष्ट्रीय आंदोलन के व्यापक स्वरूप को या तो कम करके आंका गया या विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया। इसी पृष्ठभूमि में भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय शिक्षा मंत्रियों ने शिक्षा को फिर से राष्ट्र के केंद्र में लाने का प्रयास किया। उत्तर प्रदेश के डॉ. मुरली मनोहर जोशी से लेकर कर्नाटक के प्रह्लाद जोशी तक, यह सफर केवल मंत्रियों के बदलने का नहीं, बल्कि एक वैचारिक संघर्ष और सुधार का सफर रहा है। डॉ. मुरली मनोहर जोशी का कार्यकाल अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का सबसे यादगार अध्याय है। उन्होंने शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की दिशा में संवैधानिक संशोधन की नींव रखी। स...
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