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जीव विज्ञान शिक्षा : परंपरा, समसामयिक चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा

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वर्ष 1998-99 से कक्षा 9 में जीव विज्ञान विषय को स्वतंत्र रूप से समाप्त कर विज्ञान विषय में समाहित कर दिया गया। इस निर्णय के दूरगामी परिणाम हुए। जीव विज्ञान केवल एक शाखा नहीं है बल्कि यह जीवन के रहस्यों को समझने की आधारशिला है। जब विद्यार्थी कक्षा 9 में पहुंचते हैं, तब उनका मस्तिष्क जिज्ञासा और खोज की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। जीव विज्ञान के पृथक विषय के रूप में अध्ययन से उनमें जीवन, प्रकृति, स्वास्थ्य, पर्यावरण और जीव-जगत के प्रति संवेदनशीलता विकसित होती। लेकिन जब इसे एकीकृत कर दिया गया, तब उसकी गहराई और विषयगत विशिष्टता कहीं न कहीं प्रभावित हुई। विज्ञान एक समग्र विषय है जिसमें भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान तीनों के तत्व होते हैं। किंतु प्रत्येक शाखा की अपनी पद्धति, अपनी भाषा और अपनी प्रयोगशाला-आधारित समझ होती है। जीव विज्ञान को अलग से पढ़ने का अर्थ केवल सैद्धांतिक जानकारी प्राप्त करना नहीं था, बल्कि प्रयोगशाला में प्रैक्टिकल करना, सूक्ष्मदर्शी से कोशिकाओं का अवलोकन करना, पादपों और जंतुओं की संरचना समझना और जीवन के विविध आयामों को करीब से देखना था। जब यह अवसर विद्यार्थियो...

ईरान-इज़रायल युद्ध और भारत की राह: दिल और दिमाग के बीच फंसी एक राष्ट्रनीति

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ईरान-इज़रायल युद्ध और भारत की राह: दिल और दिमाग के बीच फंसी एक राष्ट्रनीति लेखक: राहुल पांडे 'अविचल' जब दो राष्ट्र युद्ध की आग में झुलस रहे हों, तब केवल तलवार नहीं, विवेक भी बोलता है। ईरान और इज़रायल के बीच उठती यह ज्वाला न सिर्फ पश्चिम एशिया, बल्कि भारत के दिल और सोच को भी झकझोर रही है। भारत आज एक कठिन मोड़ पर खड़ा है — एक ओर इज़रायल है, जो वर्षों से भारत का रक्षा साथी रहा है, जिसने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहने की मिसाल दी है। दूसरी ओर ईरान है, हमारी ऊर्जा का स्रोत, हमारी संस्कृति का साझेदार और चाबहार बंदरगाह जैसा रणनीतिक सहयोगी। लेकिन सिर्फ बाहर की दुनिया नहीं, भारत का मन भी दो खेमों में बँटा है। कुछ लोग इज़रायल के साहस और निर्णायक कार्रवाई के प्रशंसक हैं, तो कुछ ईरान को साम्राज्यवाद के खिलाफ एक प्रतिरोध की आवाज़ मानते हैं। तो भारत को क्या करना चाहिए? भारत को भावनाओं से नहीं, बुद्धिमत्ता से चलना होगा। हमें युद्ध नहीं, शांति का पक्ष लेना चाहिए। हमें किसी की आँधी में उड़ने के बजाय अपना संतुलन साधना होगा — जहाँ इज़रायल से हमारी रक्षा की दीवार मज़बूत ह...

जनसंख्या आधारित हिस्सेदारी बनाम उत्तरदायित्व आधारित न्याय : निबंध

जनसंख्या आधारित हिस्सेदारी बनाम उत्तरदायित्व आधारित न्याय राहुल पांडे अविचल  भूमिका: भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां संसाधनों का वितरण, प्रतिनिधित्व और योजनाएं जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर की जाती हैं। किंतु एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या हिस्सेदारी केवल संख्या बल के आधार पर होनी चाहिए, या फिर उस उत्तरदायित्व के आधार पर जो किसी ने देशहित में निभाया है? यह विचार केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक संसाधनों, योजनाओं और सामाजिक न्याय की संपूर्ण प्रणाली पर प्रभाव डालता है। मुख्य तर्क: देश की स्वतंत्रता के समय सभी राज्यों को समान अवसर प्राप्त थे। समय के साथ कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण को प्राथमिकता दी, जागरूकता फैलाई और सीमित संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग किया। वहीं, कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की ओर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई। इसका परिणाम यह हुआ कि संसाधनों का दबाव बढ़ा और विकास की गति प्रभावित हुई। अब यदि संसाधनों या लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी केवल जनसंख्या के आधार पर की जाती है, तो यह उन राज्यों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने जिम्मेदारी से...